October 17, 2026 3:37 am

Prahaar The Untold Story of Ujjwal Nikam Movie Review: राजकुमार राव भी नहीं बचा पाए फिल्म, कसाब की कहानी में रोमांच गायब

Prahaar The Untold Story of Ujjwal Nikam Movie Review: 26/11 मुंबई आतंकी हमले पर अब तक कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं. किसी ने कमांडो और पुलिस के नजरिए से इस खौफनाक हमले को दिखाया, तो किसी ने अस्पतालों में घायलों की जान बचाने में जुटे डॉक्टरों और नर्सों की कहानी सुनाई. अब फिल्म ‘प्रहार’ के जरिए इस घटना को कानूनी नजरिए से दिखाने की कोशिश की गई है. फिल्म में राजकुमार राव सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका में हैं, जिन्होंने अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमे में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन सवाल यह है कि जब इस हमले की कहानी पहले ही कई बार पर्दे पर दिखाई जा चुकी है, तो ‘प्रहार’ ऐसा क्या नया लेकर आई है, जो दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सके?

कहानी में नया क्या है?

26/11 के मुंबई आतंकी हमले पर बनी फिल्मों और वेब सीरीज की बात करें तो राम गोपाल वर्मा की ‘The Attacks of 26/11’ (2013) ने हमले की भयावहता और आतंकियों की क्रूरता को दिखाया था. वहीं, ‘Hotel Mumbai’ (2018) में ताज होटल के भीतर फंसे लोगों और उन्हें बचाने की कोशिशों पर फोकस किया गया. वेब सीरीज ‘State of Siege: 26/11’ (2020) में सुरक्षा बलों के ऑपरेशन को प्रमुखता दी गई, जबकि ‘Mumbai Diaries 26/11’ (2021) ने अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के संघर्ष को दिखाया.

ऐसे में ‘प्रहार’ की जिम्मेदारी थी कि वह इस घटना का कोई ऐसा पहलू सामने लाती, जो दर्शकों के लिए नया और दिलचस्प होता. फिल्म ने अदालत और सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका को केंद्र में रखा है. लेकिन केवल कहानी का नजरिया बदल देने से कोई फिल्म दिलचस्प नहीं हो जाती. इसके लिए मजबूत पटकथा, प्रभावशाली स्क्रीनप्ले और ऐसा रोमांच जरूरी होता है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखे. ‘प्रहार’ इसी मोर्चे पर कमजोर पड़ती है.

यदि फिल्म को उज्ज्वल निकम की बायोपिक के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई है, तो यहां भी सवाल खड़े होते हैं. किसी शख्स की जिंदगी पर फिल्म बनाने के लिए सिर्फ उसका चर्चित होना काफी नहीं होता. उसके व्यक्तित्व, संघर्ष, निजी जिंदगी और पेशेवर सफर को इस तरह सामने लाना जरूरी होता है कि दर्शक उससे जुड़ सकें. ‘प्रहार’ निकम के कामकाजी जीवन और उनकी कानूनी लड़ाई को तो दिखाती है, लेकिन उनके किरदार को किसी यादगार सिनेमाई अनुभव में तब्दील नहीं कर पाती.

अविनाश अरुण की कोशिश भी नहीं आई काम

फिल्म के निर्देशक अविनाश अरुण ने कहानी को संभालने और उसे प्रभावशाली बनाने की पूरी कोशिश की है. फिल्म की प्रस्तुति में गंभीरता है और कुछ दृश्य अपनी छाप भी छोड़ते हैं. लेकिन समस्या कहानी के मूल में है. नई बोतल में पुरानी शराब डालकर उसकी कितनी भी बेहतरीन पैकेजिंग क्यों न कर ली जाए, उसका प्रभाव व्यापक नहीं हो पाता. ‘प्रहार’ को देखते हुए कुछ ऐसा ही महसूस होता है.

ऐसा लगता है कि या तो फिल्म जल्दबाजी में बनाई गई है या फिर पहले से परिचित कहानी को एक बंद डिब्बे से निकालकर थोड़ा साफ-सुथरा किया गया, उस पर रंग-रोगन किया गया और नए अंदाज में दर्शकों के सामने रख दिया गया. लेकिन चमकदार पैकेजिंग के बावजूद कहानी में नयापन और रोमांच पैदा नहीं हो पाया. 26/11 की घटना और कसाब के मुकदमे की जानकारी रखने वाले दर्शकों के लिए फिल्म में ऐसा बहुत कम है, जो उन्हें चौंका सके.

राजकुमार राव के अभिनय में नयापन नहीं दिखा

राजकुमार राव उन अभिनेताओं में हैं, जिनसे दर्शक हर फिल्म में कुछ नया और प्रभावशाली करने की उम्मीद करते हैं. उज्ज्वल निकम जैसे गंभीर और चर्चित किरदार को निभाने का मौका उनके लिए एक बड़ी चुनौती था. लेकिन इस बार राजकुमार राव अपने अभिनय से चौंकाने में नाकाम रहते हैं. वह किरदार की गंभीरता को बनाए रखते हैं, लेकिन उनके अभिनय में वह धार और प्रभाव नजर नहीं आता, जो फिल्म को ऊंचाई दे सके.

राजकुमार राव की कास्टिंग को लेकर दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक थीं, लेकिन स्क्रीन पर उनका प्रदर्शन औसत ही रह जाता है. किरदार में मेहनत दिखाई देती है, मगर वह असर पैदा नहीं होता, जिसकी इस तरह की फिल्म से उम्मीद की जाती है.

इसके उलट, अजमल कसाब के किरदार में मराठी अभिनेता ललित प्रभाकर बहुत ज़्यादा प्रभावित करते हैं. कसाब के भीतर की क्रूरता, चालाकी, झूठ और अदालत में बचने की कोशिशों को उन्होंने प्रभावी ढंग से पेश किया है. उसके चेहरे पर बदलते भाव और सुनवाई के दौरान उसका व्यवहार किरदार को विश्वसनीय बनाते हैं. फिल्म के कुछ दिलचस्प हिस्सों में कसाब का किरदार भी एक अहम वजह बनकर उभरता है.

सिकंदर खेर और आशीष विद्यार्थी ने किया न्याय

फिल्म में कुछ अन्य कलाकार भी हैं, जो अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं. कसाब के वकील अब्बास काजी की भूमिका में सिकंदर खेर प्रभावी नजर आते हैं. वहीं, जज के किरदार में आशीष विद्यार्थी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं. दोनों कलाकार अदालत से जुड़े दृश्यों को विश्वसनीय बनाने में मदद करते हैं.

हालांकि, अच्छे कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म का कोर्टरूम ड्रामा उस स्तर का तनाव और रोमांच पैदा नहीं कर पाता, जिसकी उम्मीद की जाती है. कलाकार अपने हिस्से का काम करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले उनकी कोशिशों का पूरा फायदा नहीं उठाने देता.

जयदीप अहलावत और वामिका गब्बी की कास्टिंग क्यों?

फिल्म में जयदीप अहलावत और वामिका गब्बी जैसे प्रतिभाशाली कलाकार भी हैं, लेकिन उनके होने का पूरा फायदा फिल्म को नहीं मिलता. खासकर वामिका गब्बी का किरदार उज्ज्वल निकम की पत्नी के रूप में सामने आता है. फिल्म उनके जरिए एक व्यस्त वकील की निजी जिंदगी और परिवार पर उसके काम के असर को दिखाना चाहती है. निकम और उनके बेटे के बीच पिता-पुत्र का तनाव भी इसी कहानी का हिस्सा है.

यह ट्रैक अपने आप में बुरा नहीं है. एक ऐसे व्यक्ति की कहानी, जो अपने पेशे के लिए परिवार को पर्याप्त समय नहीं दे पाता, भावनात्मक रूप से असरदार हो सकती थी. लेकिन फिल्म इस पहलू को भी बेहद अनुमानित तरीके से आगे बढ़ाती है. पिता से बेटे तक उम्मीदों और दबाव के पहुंचने की कहानी में गहराई लाने का मौका था, लेकिन इसे जल्दबाजी में सुलझा दिया जाता है.

जयदीप अहलावत और वामिका गब्बी जैसे कलाकारों को फिल्म में शामिल करने के बावजूद उनके किरदार कहानी में कोई ऐसा प्रभाव नहीं छोड़ते, जो लंबे समय तक याद रहे. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन कलाकारों की लोकप्रियता का फायदा उठाने की कोशिश की गई? कम से कम फिल्म के अंतिम नतीजे को देखकर तो उनकी कास्टिंग का पूरा औचित्य समझ नहीं आता.

फिल्म के कुछ सीन जरूर करते हैं प्रभावित

ऐसा नहीं है कि ‘प्रहार’ में कुछ भी अच्छा नहीं है. फिल्म में कुछ ऐसे पल जरूर हैं, जो दर्शकों को रोकते हैं और कहानी से जोड़ने की कोशिश करते हैं.

राजकुमार राव के किरदार और उनके बेटे के बीच बातचीत वाले दृश्य भावनात्मक असर छोड़ते हैं. इन दृश्यों में एक पिता की पेशेवर जिम्मेदारियों और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच का संघर्ष दिखाई देता है. रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी के दृश्य भी हमले की भयावहता को दोबारा सामने लाते हैं. इसके अलावा अदालत में एक छोटी बच्ची की गवाही वाला प्रसंग भी प्रभावशाली है. यह हिस्सा दिखाता है कि ऐसे मुकदमों में गवाही और सबूत कितनी अहम भूमिका निभाते हैं.

फिल्म की एक खास बात यह भी है कि वह 26/11 के हमले को केवल धार्मिक टकराव के रूप में पेश करने के बजाय मानवता के खिलाफ अपराध के तौर पर देखने की कोशिश करती है. अदालत की प्रक्रिया और सबूतों को अहमियत देकर वह न्यायिक व्यवस्था की भूमिका पर जोर देती है. यह नजरिया स्वागतयोग्य है.

लेकिन समस्या यह है कि कुछ अच्छे दृश्य पूरी फिल्म को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

कहानी में रोमांच नहीं, सब कुछ पहले से पता

‘प्रहार’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी सपाट कहानी है. 26/11 हमले और कसाब के मुकदमे के बारे में दर्शकों का एक बड़ा वर्ग पहले से जानता है. ऐसे में फिल्म को घटनाओं की जानकारी देने से आगे बढ़कर उन्हें किसी नए तरीके से पेश करना चाहिए था. लेकिन यहां कई दृश्य पहले देखे हुए लगते हैं.

मिसाल के तौर पर, एक दृश्य में कसाब को मुर्दाघर ले जाया जाता है, जहां उसके साथियों के शवों की हालत दिखाई जाती है. इस तरह के दृश्य दर्शकों को राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘The Attacks of 26/11’ की याद दिलाते हैं, जो 2013 में रिलीज हुई थी. यानी जिस घटना को पहले ही पर्दे पर विस्तार से दिखाया जा चुका है, उसे दोबारा पेश करते समय भी ‘प्रहार’ पर्याप्त नवीनता नहीं ला पाती.

क्या सिनेमाघर में देखने लायक है ‘प्रहार’?

फिल्म का विषय गंभीर है और उज्ज्वल निकम की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. लेकिन किसी वास्तविक घटना का महत्व अपने आप में एक अच्छी फिल्म की गारंटी नहीं होता. फिल्मकारों को यह भी साबित करना होता है कि उनकी कहानी कहने की जरूरत क्यों है और वह दर्शकों को नया क्या दे रही है.

निर्देशक अविनाश अरुण की कोशिश, राजकुमार राव की मौजूदगी और ललित प्रभाकर का प्रभावशाली अभिनय भी फिल्म की बुनियादी कमजोरियों को दूर नहीं कर पाते. कुछ अच्छे दृश्य जरूर हैं, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म में न तो कोर्टरूम का रोमांच है और न ही ऐसा भावनात्मक पक्ष, जो कहानी को यादगार बना सके.

मेरे हिसाब से यह फिल्म सिनेमाघर में देखने के लिए पैसे खर्च करने लायक नहीं है. इसे सीधे OTT पर रिलीज किया जाता, तो दर्शकों का समय और पैसा दोनों बच सकते थे. 26/11 जैसी भयावह घटना और उज्ज्वल निकम जैसे चर्चित किरदार पर फिल्म बनाने का विचार अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब कहानी में नयापन, रोमांच और अभिनय का अपेक्षित स्तर न हो, तो ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत पर सवाल उठना लाजिमी है.

मेरी रेटिंग: 2/5 स्टार

मुकेश कुमार गजेंद्र, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Cricket Live

Horoscope

Share Market