Rajya Sabha Election: राजनीति में एक दरवाजा बंद होना हमेशा कहानी का अंत नहीं होता. खासकर बीजेपी जैसी पार्टी में, जहां संगठन, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और चुनावी जरूरतें मिलकर टिकट का फैसला करती हैं. उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए जिन चेहरों को मौका नहीं मिल पाया, उनके लिए फिलहाल निराश होने की जरूरत नहीं है. वजह है जनवरी 2027. यूपी में विधान परिषद की 11 सीटों पर सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है और यहीं से कई नेताओं की राजनीतिक किस्मत फिर करवट ले सकती है.
मौजूदा समीकरणों को देखें तो राज्यसभा की रेस में जिन नामों की चर्चा थी और जिन्हें आखिरकार मौका नहीं मिला, उनके लिए MLC का रास्ता खुला हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि विधान परिषद की इन सीटों पर भी पार्टी के सामने वही सवाल होगा – नए सामाजिक समीकरण कैसे साधे जाएं, किन इलाकों को प्रतिनिधित्व मिले और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किस चेहरे को राजनीतिक जिम्मेदारी देकर संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए.
जनवरी में 11 सीटें, कई चेहरे बदलने की तैयारी?
उत्तर प्रदेश विधान परिषद में 30 जनवरी 2027 के आसपास 11 सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इनमें स्वतंत्र देव सिंह, ए.के. शर्मा, कुंवर मानवेन्द्र सिंह, गोविन्द नारायण शुक्ला, सलिल विश्नोई, अश्वनी त्यागी, धर्मेंद्र सैंथवार, धर्मवीर प्रजापति, सुरेंद्र चौधरी और दारा सिंह चौहान जैसे नाम शामिल हैं.
यही वह जगह है जहां बीजेपी के लिए सिर्फ खाली होने वाली सीटों की संख्या मायने नहीं रखती, बल्कि आने वाला विधानसभा चुनाव बड़ा फैक्टर होगा. 2027 का चुनाव सामने है. ऐसे में पार्टी के लिए विधान परिषद सिर्फ सदन में संख्या बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का भी माध्यम होगी.
मौजूदा चर्चा का सबसे अहम पहलू यही है कि दो मंत्रियों को छोड़कर बाकी सीटों पर बड़े पैमाने पर रिपीट होने की संभावना कम मानी जा रही है. अगर पार्टी वास्तव में नए चेहरों को आगे बढ़ाने का फैसला करती है, तो राज्यसभा की दौड़ में पीछे रह गए कई नेताओं को यहां अपनी जगह मिल सकती है.
राज्यसभा की लिस्ट ने पहले ही बता दिया पार्टी का मूड
राज्यसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने यूपी से जिन आठ उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, उनकी सूची पर नजर डालें तो पार्टी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को खास तवज्जो दी है. ओबीसी से धर्मपाल सिंह और प्रकाश पाल जैसे नाम हैं, जबकि श्रुति गंगवार को भी जगह मिली है. अनुसूचित जाति से विद्यासागर सोनकर और प्रियंका रावत, ब्राह्मण चेहरे के तौर पर राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडे तथा क्षत्रिय वर्ग से राम प्रताप सिंह चौहान का नाम सामने आया.
मंगलवार को नामांकन के दौरान बीजेपी ने पूरी ताकत के साथ अपना राजनीतिक संदेश भी दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक समेत पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. आठों उम्मीदवारों ने वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया.
लेकिन राजनीति का दिलचस्प हिस्सा वह है जो लिस्ट में नहीं है. क्योंकि जिन नामों की चर्चा राज्यसभा के लिए हुई, उनमें कई ऐसे चेहरे भी थे जिनका राजनीतिक वजन कम नहीं है.
स्मृति ईरानी से कुमार विश्वास तक, चर्चा लंबी थी
राज्यसभा के लिए संभावित नामों की चर्चाओं में कवि कुमार विश्वास से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तक के नाम सामने आए. इसके अलावा संजीव बालियान, हरदीप सिंह पुरी, बी.एल. वर्मा, राजवीर सिंह, हरीश द्विवेदी, सुब्रत पाठक, त्र्यंबक त्रिपाठी, दुर्विजय शाक्य और सुरेश राणा जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम भी चर्चा में रहे.
महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से स्मृति ईरानी, गीता शाक्य, रेखा वर्मा और प्रियंका रावत जैसे नामों की चर्चा रही. इसके अलावा कौशल किशोर, कामेश्वर सिंह, दिलीप पटेल, अनिल अग्रवाल, राजेंद्र अग्रवाल, ममतेश शाक्य, रामपति राम त्रिपाठी, सत्यपाल सिंह, बृजलाल, रामशंकर कठेरिया और प्रकाश पाल समेत कई नेताओं के नाम संभावित सूची में घूमते रहे.
यह पूरी कवायद एक बात की ओर इशारा करती है. बीजेपी के पास नेताओं की कमी नहीं है, बल्कि चुनौती यह तय करने की है कि किस चेहरे को कब और किस भूमिका में इस्तेमाल किया जाए.
राज्यसभा नहीं तो MLC… और मौका बड़ा है
यहीं से जनवरी की विधान परिषद की 11 सीटें महत्वपूर्ण हो जाती हैं. अगर राज्यसभा में कुछ नेताओं की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं, तो MLC के जरिए उन्हें सदन में लाने का विकल्प पार्टी के पास मौजूद रहेगा. और यह सिर्फ राजनीतिक पुनर्वास का मामला नहीं होगा.
विधान परिषद के चुनाव के समय 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद करीब होगा. ऐसे में पार्टी जिन नेताओं को MLC बनाएगी, उनके जरिए जातीय और क्षेत्रीय समीकरण भी साधे जा सकते हैं. पश्चिमी यूपी, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध और ब्रज क्षेत्र के बीच संतुलन से लेकर ओबीसी, दलित, ब्राह्मण और क्षत्रिय प्रतिनिधित्व तक, हर पहलू पर नजर रहेगी.
असली खेल 2027 का है
दरअसल, जनवरी की MLC सीटों को सिर्फ ‘खाली होने वाली 11 सीटों’ के तौर पर देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी. बीजेपी के लिए यह 2027 से पहले अपने राजनीतिक कुनबे को नए सिरे से व्यवस्थित करने का मौका भी हो सकता है.
कुछ पुराने चेहरों को बरकरार रखना संगठनात्मक निरंतरता का संकेत होगा, जबकि नए चेहरों को मौका देना बदलाव और सामाजिक विस्तार का संदेश दे सकता है. पार्टी अगर नए नामों पर दांव लगाती है तो राज्यसभा में टिकट से चूके नेताओं के लिए यह दूसरा मौका होगा. और अगर उन्हें विधान परिषद के रास्ते सदन में लाया जाता है, तो यह साफ संदेश होगा कि पार्टी ने उन्हें दरकिनार नहीं किया, सिर्फ उनकी बारी बदली है.
इसलिए राज्यसभा की हार को अंतिम मानना जल्दबाजी
बीजेपी की राजनीति में टिकट मिलना और न मिलना अक्सर अंतिम फैसला नहीं होता. कई बार संगठन पहले किसी नेता को इंतजार कराता है और फिर उससे बड़ी भूमिका सामने रख देता है. यूपी में जनवरी 2027 की विधान परिषद की सीटें इसी राजनीतिक इंतजार का अगला पड़ाव बन सकती हैं.
इसलिए राज्यसभा की सूची में नाम नहीं देखकर जिन बीजेपी नेताओं के समर्थकों में मायूसी है, उन्हें शायद कैलेंडर पर नजर रखनी चाहिए. जनवरी दूर नहीं है. राज्यसभा नहीं तो MLC सही. और अगर विधानसभा चुनाव का गणित साथ रहा, तो विधान परिषद की ये 11 सीटें बीजेपी के कई नेताओं के लिए सिर्फ ‘दूसरा मौका’ नहीं, बल्कि 2027 की बड़ी राजनीतिक भूमिका का दरवाजा भी बन सकती हैं.









