मुकेश कुमार गजेंद्र, वरिष्ठ फिल्म पत्रकार
हिंदुस्तान के घर-घर में ओटीटी को पहचान दिलाने वाली वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ अब फिल्म बनकर बड़े पर्दे पर रिलीज हो चुकी है. लेकिन सवाल यही है कि छोटे पर्दे पर बना इसका भौकाल क्या बड़े पर्दे की कसौटी पर भी उतना ही असरदार है? क्या यह फिल्म दर्शकों को उसी तरह एंटरटेन करने में कामयाब हो पाई है? क्या इसके किरदारों का वही बाहुबल, रुतबा और रौला नजर आता है? इन सभी सवालों के जवाब हम आगे जानेंगे. लेकिन पहले इतना जरूर कहेंगे कि ‘मिर्जापुर’ का भौकाल कायम है.
फिल्म ‘मिर्जापुर- द मूवी’ की सबसे खास बात यह है कि इसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि सीरीज के किसी लंबे एपिसोड को उठाकर सिनेमाघर में परोस दिया गया है. मेकर्स ने इसे एक मुकम्मल फिल्म का रूप दिया है. गजब का सिनेमाई ट्रीटमेंट देखने को मिलता है. हर किरदार करीने से गढ़ा गया है. उनके संवाद जितने धारदार हैं, उतनी ही सनसनी पैदा करते हैं. जो कभी चौंकाते हैं, कभी हंसाते हैं और कई बार सीटियां बजाने पर मजबूर कर देते हैं.
एक्शन इतना धांसू है कि कई सीन देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. फिल्म में मौजूद हर कलाकार ने अद्भुत काम किया है. निर्देशक ने हर कलाकार को अपने किरदार में छाने का पूरा मौका दिया है. रोल छोटा हो या बड़ा, किसी भी किरदार की अहमियत कम नहीं होती. फिल्म की आत्मा वही है, जिसने ‘मिर्जापुर’ को दर्शकों के बीच कल्ट फॉलोइंग दिलाई है. नए दर्शकों को तो इसका मजा और भी ज्यादा आने वाला है.
बाहुबल, सत्ता और बदले का खेल
फिल्म ‘मिर्जापुर- द मूवी’ की पटकथा इसकी सबसे मजबूत कड़ी है. सत्ता की लड़ाई, पुरानी दुश्मनी, बदले की आग और रिश्तों में छिपी दरारों को कहानी एक साथ आगे बढ़ाती है. घटनाएं लगातार करवट लेती हैं. कहीं-कहीं कहानी की पकड़ थोड़ी ढीली पड़ती है, लेकिन निर्देशक तुरंत लगाम खींच लेते हैं. इसके बाद कहानी फिर सरपट दौड़ने लगती है. इसके लिए फिल्म के लेखक पुनीत कृष्णा और निर्देशक गुरमीत सिंह बधाई के पात्र हैं.
गुरमीत ने फिल्म के अलग-अलग रंगों के बीच शानदार संतुलन साधा है. एक्शन, ड्रामा और वॉयलेंस के साथ इमोशन और कॉमेडी की ऐसी रेसीपी तैयार की गई है, जो लाजवाब है. निर्देशक ने ‘मिर्जापुर’ की मूल पहचान के साथ छेड़छाड़ किए बिना उसे बड़े पर्दे की जरूरत के मुताबिक विस्तार दिया है.
फिल्म की जान हैं इसके संवाद
फिल्म ‘मिर्जापुर- द मूवी’ में डायलॉग जबरदस्त हैं. शुरुआत से लेकर आखिरी सीन तक संवादों पर की गई मेहनत साफ महसूस होती है. हर डायलॉग किरदार और कहानी के मिजाज के मुताबिक असर छोड़ता है. किरदारों की भाषा, उनका अंदाज, बातचीत का तेवर और उनके बीच की तल्खी ‘मिर्जापुर’ की पहचान को और मजबूत करते हैं.
मसलन, ‘हम बाहुबली हैं, मारते नहीं, मारने का ऑर्डर देते हैं’, ‘ईमानदारी अजगर है, लपेटे आप हैं, दम हमारा घुट रहा है’, ‘जानते हो ना किसकी मम्मी हैं हम?’ और ‘हमारा बाप कौन है, ये तो बहुत बार सुना था, लेकिन हम किसकी मम्मी हैं, ये पहली बार सुना है’ जैसे डायलॉग थिएटर से निकलने के बाद भी दर्शकों के जेहन में जिंदा रहने वाले हैं.
एक्शन में दिखा असली भौकाल
‘मिर्जापुर- द मूवी’ की दुनिया में एक्शन महज कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी पहचान है. फिल्म में इसे बड़े पर्दे के हिसाब से और ज्यादा प्रभावशाली बनाया गया है. मारधाड़ ज्यादा रॉ है, टकराव ज्यादा हिंसक हैं और कई सीक्वेंस थिएटर में सीटियां और तालियां बटोरने का पूरा दम रखते हैं. खासकर फिल्म का प्री-क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स वाला हिस्सा इसकी बड़ी ताकत बनकर सामने आता है. जैसलमेर के रेगिस्तानी इलाकों में फिल्माए गए दृश्य कहानी को एक अलग विजुअल स्केल देते हैं और पर्दे पर इनका असर साफ महसूस होता है.
सेकेंड हाफ को क्लाइमेक्स ने संभाला
फिल्म में इंटरवल के बाद कहानी की रफ्तार कुछ जगह धीमी पड़ती है. सेकेंड हाफ थोड़ा लंबा महसूस होता है. लेकिन जैसे-जैसे क्लाइमेक्स करीब आता है, फिल्म की पकड़ दोबारा मजबूत हो जाती है. खासकर गुड्डू पंडित और मुन्ना त्रिपाठी के बीच का हिस्सा फिल्म के सबसे मजेदार और यादगार पलों में शामिल है. यहीं मेकर्स भविष्य के लिए भी दरवाजा खोल देते हैं. अंत यह संकेत देने में पीछे नहीं रहता कि ‘मिर्जापुर’ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. यानी सेकेंड पार्ट भी कतार में है.
पुराने-नए कलाकारों ने दिखाया दम
फिल्म ‘मिर्जापुर- द मूवी’ की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार और उन्हें निभाने वाले कलाकार हैं. कालीन भैया के किरदार में पंकज त्रिपाठी का भौकाल कायम है. वह पहले से भी ज्यादा मजबूत नजर आए हैं. बाहुबली होने के बावजूद उनकी शुद्ध हिंदी में बोले गए संवाद अलग प्रभाव छोड़ते हैं.
मुन्ना भैया के किरदार में दिव्येंदु का क्या ही कहना. अब वह एक परिपक्व अभिनेता के तौर पर नजर आते हैं. बाहुबली के बिगड़ैल बेटे का किरदार उन्होंने बखूबी निभाया है. गुड्डू पंडित के किरदार में अली फजल अपने अंदाज और दमदार अभिनय से खासा प्रभावित करते हैं. फिल्म में उनका किरदार कई मौकों पर मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स के हल्क की याद दिलाता है. कभी खूंखार डॉन, कभी मासूम बेटा, कभी विद्रोही, तो कभी प्यारा भाई, अली फजल हर रंग में जंचते हैं. उनके किरदार के अलग-अलग शेड्स फिल्म को और दिलचस्प बनाते हैं.
फिल्म में रवि किशन ने जमाया रंग
नए कलाकारों में सबसे ज्यादा प्रभावित रवि किशन ने किया है. सही मायने में यह उनके करियर का गोल्डन पीरियड चल रहा है. उन्हें लगातार ऐसी फिल्में मिल रही हैं, जो उनके अंदर छिपे कलाकार को खुलकर छाने का मौका दे रही हैं. बब्बन यादव के किरदार में वह बेहद मजबूत नजर आए हैं. उनकी मौजूदगी सामने वाले कलाकार के किरदार को भी मजबूती देती है. फिल्म में उन्हें पर्याप्त स्क्रीन टाइम भी मिला है.
‘पंचायत’ वेब सीरीज वाले जितेंद्र कुमार इस बार विक्रांत मैसी की जगह नजर आते हैं. बबलू पंडित के किरदार को निभाने में उन्होंने पूरी ईमानदारी दिखाई है. हालांकि, जिन दर्शकों ने इस किरदार में विक्रांत मैसी का सशक्त अभिनय देखा है, उनके लिए जितेंद्र को इस भूमिका में स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है.
इनके अलावा अभिषेक बनर्जी, मोहित मलिक, राजेश तैलंग, प्रमोद पाठक, सोनल चौहान, शीबा चड्ढा, श्रिया पिलगांवकर और सुशांत सिंह ने अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय किया है. रसिका दुग्गल और कुलभूषण खरबंदा के पास फिल्म में करने के लिए खास कुछ नहीं है, लेकिन आखिरी सीन में दोनों सरप्राइज करते हैं.
पैसा वसूल है फिल्म ‘मिर्जापुर- द मूवी’
कुल मिलाकर ‘मिर्जापुर- द मूवी’ उम्मीदों पर काफी हद तक खरी उतरती है. दमदार संवाद, सत्ता और बदले की दिलचस्प कहानी, जबरदस्त एक्शन और शानदार कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को एक मुकम्मल एंटरटेनर बनाती है. सेकेंड हाफ में थोड़ी सुस्ती जरूर आती है, लेकिन क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म फिर अपनी रफ्तार और पकड़ हासिल कर लेती है.
‘मिर्जापुर’ सीरीज के फैंस के लिए यह अपने पसंदीदा किरदारों को बड़े पर्दे पर पहले से ज्यादा भव्य और दमदार अंदाज में देखने का शानदार मौका है. वहीं, जिन्होंने अब तक ‘मिर्जापुर’ की वेब सीरीज नहीं देखी है, उनके लिए भी यह फिल्म तेज रफ्तार, हिंसा, हास्य, ड्रामा और बदले से भरपूर एक मनोरंजक गैंगस्टर ड्रामा साबित होती है.
रेटिंग: 4/5








