मुकेश कुमार गजेंद्र
वरिष्ठ फिल्म पत्रकार, फेसबुक से साभार
Batwara 1947 Review: सन्नी देओल एक बार फिर पर्दे पर लौटे हैं. आवाज में वही गरज है, आंखों में वही गुस्सा और पर्दे पर फिर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बैकड्रॉप. लेकिन इस बार कहानी तारा सिंह की नहीं, सिकंदर मिर्जा की है. सवाल ये है कि ‘गदर’ जैसी विरासत के सामने ‘बंटवारा 1947’ कितनी देर टिक पाती है?
साल 2001 में रिलीज हुई फिल्म ‘गदर: एक प्रेम कथा’ बॉलीवुड अभिनेता सन्नी देओल के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार है. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 133.12 करोड़ (वर्ल्डवाइड) का कलेक्शन करके धमाल मचा दिया था. इसके बाद साल 2023 में रिलीज हुई इस फिल्म के सीक्वल ने बॉक्स ऑफिस के कई कीर्तिमान तोड़ते हुए 686 करोड़ रुपए कमा लिए. इस फिल्म से सन्नी का कमबैक भी हुआ.
इन दोनों फिल्मों की धांसू परफॉर्मेंस को देखते हुए आमिर खान प्रोडक्शंस ने सन्नी देओल को लेकर फिल्म ‘बंटवारा 1947’ का तानाबाना बुना. इसकी सफलता को और अधिक सुनिश्चित करने के लिए सन्नी के सफलतम निर्देशकों में शामिल राजकुमार संतोषी को फिल्म की बागडोर दी गई. फिल्म को और भारी बनाने के लिए ए.आर. रहमान को लिया गया.
अब सवाल यही है कि इतने बड़े नामों की इस रेसिपी से पकाई गई फिल्म अपना प्रभाव छोड़ पाती है? क्या ये ‘गदर’ की परंपरा को आगे बढ़ा पाती है? क्या ये फिल्म सन्नी के सहारे उनके बेटे करण देओल के करियर की नैया पार लगा पाती है?
मेरठ से लाहौर तक पहुंचती है कहानी
असगर वजाहत के मशहूर नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या ओ जम्याई नई’ (जिसने लाहौर नहीं देखा, वो जन्मा ही नहीं) पर आधारित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ की कहानी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से शुरू होकर पाकिस्तान के लाहौर में खत्म होती है. साल 1947. आजादी की खुशी के बीच बंटवारे की आग लग चुकी है. हर तरफ दंगे भड़के हुए हैं. मारकाट मची हुई है. हिंदू और सिख शहर के मुस्लिम परिवारों को खोज-खोजकर उन पर हमला कर रहे हैं.
नफरत की ये आग कारोबारी सिकंदर मिर्जा (सन्नी देओल) के परिवार तक पहुंच जाती है. वो अपने एक दोस्त के कहने पर अपनी बेगम हमीदा मिर्जा (प्रीति जिंटा), बेटे जावेद (करण देओल) और बेटी तन्नो (खुशी हजारे) के साथ लाहौर चले जाते हैं. लेकिन ट्रेन पर हमला हो जाता है. इसी हमले में उनका बेटा और दोस्त का परिवार भारत में छूट जाते हैं. जावेद के सामने मिर्जा के दोस्त के परिवार को बर्बरतापूर्वक मार दिया जाता है. इस घटना के बाद उसके मन में हिंदुओं के प्रति नफरत भर जाती है. अब वो हर कीमत पर उनसे बदला लेना चाहता है.
इधर, लाहौर पहुंचने के बाद सिकंदर मिर्जा को शायर हबीब (अली फजल) की मदद से एक हिंदू हवेली अलॉट हो जाती है. मिर्जा परिवार हवेली पहुंचता है, तो वहां एक बुजुर्ग हिंदू महिला दुर्गावती (शबाना आजमी) को देखकर दंग रह जाता है. उनका पूरा परिवार दंगों में मारा जा चुका है. लाख कहने के बावजूद दुर्गावती हवेली छोड़कर जाने को तैयार नहीं होतीं. मिर्जा परिवार उन्हें वहां से हटाने की कई तरकीबें अपनाता है, लेकिन नाकाम रहता है. फिर कहानी करवट लेती है.
मिर्जा परिवार को दुर्गावती में अपनी मां नजर आने लगती है. वो उन्हें ‘माई’ कहकर बुलाने लगते हैं. जिस महिला को कल तक हवेली से निकालने की कोशिश की जा रही थी, वही धीरे-धीरे परिवार का हिस्सा बन जाती है. लेकिन मोहल्ले के मुस्लिम नेता किसी भी कीमत पर इस हिंदू महिला को हिंदुस्तान भेजना चाहते हैं. उनकी अगुवाई स्थानीय अपराधी कम नेता याकूब खान (अभिमन्यु सिंह) करता है.
माई को बचाने के लिए सिकंदर मिर्जा किसी भी हद तक जाने को तैयार है. यहां तक कि अपने परिवार के साथ अपनी जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटता. अब क्या मिर्जा परिवार माई को हिंदुस्तान जाने से रोक पाता है? ये जानने के लिए फिल्म देखनी होगी.
‘गदर’ बनाने के चक्कर में ‘बंटवारा’ की वाट लग गई
यहीं से फिल्म मुझे निराश करना शुरू करती है. आमिर खान और राजकुमार संतोषी इस फिल्म के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पाए हैं. विदित है कि आमिर चाहे फिल्म में एक्टिंग कर रहे हों, निर्देशन कर रहे हों या प्रोड्यूस, उनका पूरा दखल रहता है. फिल्म की कहानी, कास्ट, म्यूजिक से लेकर हर मामले में उनकी रुचि रहती है.
यही वजह है कि शायद राजकुमार संतोषी खुलकर काम नहीं कर पाए हैं. ऐसा पूरी फिल्म पर साफ नजर आता है. ‘गदर’ में हिंदू किरदार तारा सिंह के नजरिए से फिल्म की कहानी दिखाई गई है, वहीं ‘बंटवारा 1947’ में मुस्लिम किरदार सिकंदर मिर्जा के नजरिए से दंगों के दंश को दिखाने की कोशिश की गई है.
कागज पर ये आइडिया बेहद दिलचस्प है. लेकिन पर्दे पर आते-आते कहानी कई जगह रास्ता भटक जाती है. लाहौर की पृष्ठभूमि में कई जगह जबरन मजहबी एकता दिखाने की कोशिश लगती है, जो गले नहीं उतरती. तारा अपनी पत्नी के प्यार के लिए पाकिस्तान में लड़ता है, तो सिकंदर माई के प्यार में भिड़ता है. लेकिन दोनों फिल्मों के इमोशनल इम्पैक्ट में जमीन-आसमान का फर्क है. ‘गदर’ जहां भावनाओं को सीधे दर्शक के सीने में उतार देती थी, ‘बंटवारा 1947’ कई बार उसी भावना तक पहुंचने की कोशिश करती हुई दिखाई देती है.
फर्स्ट हाफ ने किया परेशान, सेकेंड हाफ ने संभाली कमान
फिल्म का फर्स्ट हाफ इतना स्लो है कि बोरियत होने लगती है. बेवजह के संवाद और दृश्य ऐसे लगते हैं, मानो ठूंसे गए हों. कई जगह लगता है कि कहानी आगे बढ़ने के बजाय बस समय काट रही है. लेकिन सेकेंड हाफ में फिल्म रफ्तार पकड़ती है. ज्यादातर दर्शक सन्नी देओल की फिल्मों को एक्शन के लिए देखने जाते हैं और यहां वो सन्नी नजर आने लगते हैं, जिसका इंतजार किया जा रहा था.
एक्शन के साथ इमोशन का कॉकटेल देखने को मिलता है. बंटवारे का दर्द भले ही उतनी गहराई से नहीं दिखाया गया है, लेकिन मां के प्रति ममता और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने की चाहत पुरजोर नजर आती है. और हां, कई जगह संवाद धांसू और बेहतरीन बन पड़े हैं. जैसे-
‘मां हिंदू-मुसलमान नहीं, अपने आप में एक मजहब है.’
‘कोई भी मजहब अच्छा या बुरा नहीं होता है, अच्छा या बुरा इंसान होता है.’
‘ना वो घर देखेंगे, ना सरहद, सीधा घुस के मारेंगे.’
‘तू उस्ताद को नहीं जानता… तू मेरे बाप को नहीं जानता.’
ऐसे कई संवाद हैं, जो दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर करते हैं.
यकीनन शबाना आजमी फिल्म की आत्मा हैं!
75 साल की शबाना आजमी को इस फिल्म की आत्मा कह सकते हैं. उन्हें यूं ही एक्टिंग का मास्टर क्लास नहीं कहा जाता. इस उम्र में क्या मासूमियत, क्या अदायगी, क्या संवाद अदायगी… अपने अभिनय के दम पर वो पूरी फिल्म में हर कलाकार पर भारी पड़ती हैं.
उनका किरदार फिल्म के मेलोड्रामा को संभालता है. सन्नी देओल हमेशा की तरह एक्शन सीन में जबरदस्त नजर आए हैं. उनकी आवाज, उनका गुस्सा और उनका स्क्रीन प्रेजेंस अब भी कायम है. लेकिन इमोशनल सीन में उनको रोते हुए देखना शायद कोई दर्शक नहीं चाहता.
प्रीति जिंटा बिल्कुल फ्रेश नजर आई हैं. उनको देखकर लगता नहीं कि उन्होंने 8 साल बाद फिल्मों में कमबैक किया है. अली फजल ने भी कमाल का काम किया है. कहने को तो उनको गेस्ट रोल में रखा गया है, लेकिन पूरी फिल्म में उनका प्रभाव साफ नजर आता है.
सन्नी के बेटे करण देओल को फिल्म में क्यों रखा गया, ये बात समझ नहीं आती. न तो उनका किरदार असरदार है, न ही उनका अभिनय. संवाद बोलने में भी वो तुतलाते नजर आते हैं. खलनायक के किरदार में अभिमन्यु सिंह औसत नजर आए हैं.
फिल्मों में खलनायक का कद नायक को बड़ा बनाता है
सन्नी देओल की सुपरहिट फिल्मों पर नजर डालें तो ज्यादातर में विलेन के किरदार में महान अभिनेता अमरीश पुरी रहे हैं. दोनों की जोड़ी ने बॉलीवुड को कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं. इनमें ‘घायल’ (1990), ‘विश्वात्मा’ (1992), ‘दामिनी’ (1993), ‘सलाखें’ (1998) और ‘गदर: एक प्रेम कथा’ (2001) शामिल हैं.
इन फिल्मों में उनके दमदार अभिनय, संवाद अदायगी और जबरदस्त टकराव को दर्शकों ने खूब पसंद किया. फिल्म ‘घातक’ (1996) में कात्या के किरदार में डैनी डेन्जोंगपा ने खौफ का जो माहौल कायम किया, उसका डर दर्शकों के दिल में आज भी है. इस फिल्म में भी अमरीश पुरी सन्नी के पिता के किरदार में रहे.
लेकिन ‘बंटवारा 1947’ में विलेन के किरदार में अभिमन्यु सिंह वो छाप नहीं छोड़ पाए. केवल लाल आंखें चौड़ी करने भर से कोई बड़ा विलेन नहीं बन जाता. बॉडी लैंग्वेज में वो बात नजर आनी चाहिए. एक सीन में हीरो और विलेन एक-दूसरे को आंख दिखाते हैं, लेकिन विलेन अचानक पीछे हट जाता है. ये देखकर अटपटा लगता है.
लास्ट सीन में विलेन अपनी गैंग के साथ हीरो को मारने के लिए तलवार लेकर आता है, लेकिन लोगों की भीड़ देखकर सहम जाता है. इसी बीच पुलिस आती है. एक पिस्टल लिए दरोगा उसे गिरफ्तार कर लेता है. सन्नी देओल के सामने ऐसा विलेन चाहिए था, जिसे देखकर दर्शक को लगे कि अब असली टक्कर होने वाली है. यहां वो कमी साफ महसूस होती है.
रहमान साहब को क्यों लिया, वो तो नजर नहीं आते?
संगीत की दुनिया में ए.आर. रहमान एक बड़ा नाम हैं. उनके नाम की कसमें खाई जाती हैं. उनका होना किसी फिल्म के संगीत की सफलता की गारंटी माना जाता है. लेकिन ‘बंटवारा 1947’ में वो कहीं नजर नहीं आते. फिल्म में कोई ऐसा गाना नहीं है, जिसे गुनगुनाते हुए आप थिएटर से बाहर आएं.
इस फिल्म के सभी गानों का संगीत ए.आर. रहमान ने दिया है. इसके बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं. प्रमुख गानों में रोमांटिक ट्रैक ‘ओ तबस्सुम’ (सोनू निगम) और ‘कहां चले गए हो राम’ (शान और अनुराधा पौडवाल) शामिल हैं. हां, फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जरूर बेहतरीन है. हर सीन के साथ मैच करता है और माहौल बनाने में मदद करता है. लेकिन जिस तरह के नाम इस फिल्म के संगीत से जुड़े हैं, उससे उम्मीद कुछ और बड़ी थी.
क्या फिल्म ‘बंटवारा 1947’ देखने जाना चाहिए?
देखिए, यदि आप सन्नी देओल के तगड़े वाले फैन हैं, यदि आप कुछ कलाकारों की दमदार अदाकारी देखना चाहते हैं, यदि आप ‘गदर’ को भूलकर फ्रेश माइंड से कोई फिल्म देखना चाहते हैं, तो आपको इसे जरूर देखना चाहिए. लेकिन यदि आपने आमिर खान, सन्नी देओल, राजकुमार संतोषी और ए.आर. रहमान जैसी बड़ी हस्तियों के नाम पर कोई बहुत जबरदस्त फिल्म देखने का सपना देखा है, तो ये फिल्म आपको निराश करेगी.
‘बंटवारा 1947’ में सन्नी देओल का गुस्सा है, शबाना आजमी की अदाकारी है, कुछ दमदार संवाद हैं और सेकेंड हाफ में भरपूर ड्रामा भी. लेकिन जिस फिल्म से ‘गदर’ जैसी उम्मीदें बंधी हों, उसके लिए इतना काफी नहीं है. फिल्म में जज्बात हैं, लेकिन वो गहराई नहीं, जो बंटवारे के दर्द को लंबे वक्त तक दर्शक के भीतर जिंदा रख सके. इसे औसत फिल्मों की कैटेगरी में रखा जा सकता है.








