Nepal Flash Flood: नेपाल की पहाड़ियों में उस रात शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कुछ ही मिनट बाद उनके सामने सिर्फ पानी नहीं, बल्कि तबाही का ऐसा सैलाब होगा जो रास्ते, पुल, घर और लोगों की जिंदगी अपने साथ बहा ले जाएगा. शुरुआत सीमा के उस पार हुई, लेकिन देखते ही देखते उसका असर नेपाल के कई इलाकों में दिखाई देने लगा.
रात और सुबह के बीच का वो वक्त था, जब लोग अपने घरों में थे और पहाड़ हमेशा की तरह खामोश दिख रहे थे. फिर अचानक पानी का रौद्र रूप सामने आया. ऐसा लगा जैसे पहाड़ ने अपना रास्ता बदल लिया हो. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बहने वाली ल्हेंडे सहायक नदी का पानी अचानक उफान पर आया और देखते ही देखते नीचे की तरफ बसे इलाकों को अपनी चपेट में लेने लगा.
माना जा रहा है कि नदी के प्रवाह को रोकने वाली बर्फ और मलबे की एक बड़ी परत अचानक टूटी. आशंका है कि इसके पीछे हिमस्खलन हो सकता है. उसके बाद जो हुआ, उसने नेपाल और तिब्बत दोनों को हिला दिया.
जहां सड़क थी, वहां अब सिर्फ मलबा है
सबसे पहले असर नेपाल की सीमा से सटे रासुवागढ़ी और तिमुरे इलाके में दिखाई दिया. पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला. देखते ही देखते सड़कें गायब होने लगीं. पुल टूट गए. बिजली परियोजनाओं और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा. इसके बाद सैलाब रुकने के बजाय नीचे की ओर बढ़ता गया.
रासुवा, धादिंग और नुवाकोट जिलों के कई हिस्से इसकी चपेट में आए. जिन रास्तों से रोजाना लोगों और सामान की आवाजाही होती थी, वहां अब कीचड़, पत्थर और मलबे का कब्जा है. कई जगहों पर सड़क और नदी के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि राहत और बचाव अभियान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ लोगों को ढूंढना नहीं, बल्कि उन तक पहुंचना भी है.
असली कहानी आंकड़ों से कहीं बड़ी है
नेपाल पुलिस के मुताबिक अब तक 332 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. करीब 1500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं. इनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है.
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के मुताबिक लापता लोगों में कम से कम 800 विदेशी नागरिक हो सकते हैं. अधिकारियों का कहना है कि अभी तबाही का पूरा दायरा सामने आना बाकी है. यानी जो संख्या आज सामने है, वह अंतिम तस्वीर नहीं है.
जैसे-जैसे राहत दल मलबे और नदी किनारे के इलाकों में तलाश आगे बढ़ा रहे हैं, और शव बरामद होने की आशंका जताई जा रही है, मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है.
इस तबाही में भारत की भी एक बड़ी कहानी छिपी है
नेपाल की इस त्रासदी से भारत का कनेक्शन भी गहरा है. भारत सरकार के मुताबिक 288 भारतीय नागरिक अभी संपर्क से बाहर हैं. इनमें 73 लोग त्रिशूली इलाके में एक पावर प्रोजेक्ट से जुड़े बताए जा रहे हैं. हालांकि इस बीच 21 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है. ये सभी तमिलनाडु के रहने वाले हैं और उन्हें भारत वापस लाया जा रहा है.
लेकिन कहानी सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है. तिब्बत की तरफ भी कई भारतीय फंसे हुए हैं. भारत सरकार के मुताबिक 200 से ज्यादा भारतीयों ने मदद और सुरक्षित निकासी के लिए संपर्क किया है. इनमें करीब 95 लोग दारचेन में हैं, जो हिल्सा के रास्ते नेपाल आने की कोशिश कर रहे हैं.
करीब 30 लोग जुतुलफुक से सागा की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि कुछ लोग जिलॉन्ग सिटी में हैं. यानी सैलाब के बाद अब दूसरी लड़ाई शुरू हो चुकी है – लोगों को सुरक्षित जगह तक पहुंचाने की.
सवाल सिर्फ पानी कहां से आया, इसका नहीं है
इस पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कुछ ही देर में इतना पानी आया कहां से? प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक भोटे कोशी नदी की सहायक ल्हेंडे नदी का प्रवाह अचानक बाधित हुआ. आशंका है कि हिमस्खलन के कारण बर्फ और मलबे ने पानी का रास्ता रोक दिया. फिर जब यह अवरोध टूटा, तो जमा हुआ पानी एक साथ नीचे की तरफ बढ़ा.
पहाड़ों में ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं, लेकिन इस बार जिस रफ्तार से पानी नीचे आया, उसने लोगों को प्रतिक्रिया देने का लगभग कोई मौका नहीं दिया. पहले सीमा पर बसे इलाके इसकी चपेट में आए और फिर वही पानी नीचे के इलाकों में मौत का रास्ता बनाता चला गया.
तस्वीर अभी पूरी नहीं हुई है
नेपाल इस वक्त सिर्फ तबाही का हिसाब नहीं लगा रहा. वह उन लोगों को ढूंढ रहा है जिनके बारे में उनके परिवारों को अब तक कोई खबर नहीं मिली है.
किसी के लिए फोन की घंटी का इंतजार है. किसी के लिए सड़क खुलने का. किसी परिवार की उम्मीद उस राहत दल पर टिकी है जो मलबे के बीच किसी जिंदा इंसान की तलाश कर रहा है. और इसी बीच पहाड़ों में एक और सवाल खड़ा है.
अगर यह वाकई हिमस्खलन के बाद बना फ्लैश फ्लड था, तो क्या आने वाले दिनों में ऐसे और खतरे पैदा हो सकते हैं? फिलहाल जवाब किसी के पास नहीं है.
इतना जरूर साफ है कि नेपाल में पानी उतरना शुरू हो जाए, तब भी इस तबाही का असर जल्दी नहीं उतरेगा. जिन इलाकों से सैलाब गुजरा है, वहां पीछे सिर्फ मलबा नहीं बचा है. बची है उन लोगों की तलाश, जिनका अभी तक कोई पता नहीं है.
और शायद इस त्रासदी की सबसे भयावह तस्वीर भी यही है – पानी चला गया है, लेकिन इंतजार अभी बाकी है.








