Amitabh Bachchan Rekha: हिंदी सिनेमा में कुछ जोड़ियां सिर्फ फिल्मों का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि अपने दौर की पहचान बन जाती हैं. अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी भी ऐसी ही रही. दोनों जब पर्दे पर साथ आए तो कहानी सिर्फ किरदारों की नहीं रही, निगाहें उनकी केमिस्ट्री पढ़ने लगीं और दर्शक उनके हर सीन में कुछ ऐसा तलाशने लगे, जो शायद संवादों से कहीं ज्यादा था. यही वजह है कि दशकों बाद भी अमिताभ और रेखा का नाम साथ लिया जाता है.
अमिताभ बच्चन उस दौर में बॉलीवुड के ‘एंग्री यंग मैन’ के तौर पर अपनी पहचान बना रहे थे. दूसरी तरफ रेखा अपने अभिनय और खूबसूरती के दम पर लगातार खुद को एक बेहद मजबूत अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर रही थीं. दोनों की शख्सियत बिल्कुल अलग थी, लेकिन कैमरे के सामने आते ही यह अंतर जैसे गायब हो जाता था. अमिताभ की गंभीरता और रेखा की भावनात्मक गहराई ने मिलकर पर्दे पर एक ऐसा असर पैदा किया, जिसे दर्शकों ने लंबे वक्त तक महसूस किया.
‘दो अनजाने’ से शुरू हुआ सिलसिला
अमिताभ और रेखा की साथ काम करने की कहानी 1976 की फिल्म ‘दो अनजाने’ से जुड़ती है. यह सिर्फ दो बड़े कलाकारों की एक साथ फिल्म नहीं थी. इसी फिल्म के बाद दर्शकों ने दोनों की जोड़ी में एक खास आकर्षण महसूस किया. कहानी में रिश्तों, महत्वाकांक्षा और धोखे के बीच दोनों के किरदारों का टकराव था और यही टकराव उनकी स्क्रीन केमिस्ट्री को खास बनाता गया.
इसके बाद ‘आलाप’ और ‘खून पसीना’ जैसी फिल्मों में भी दोनों साथ नजर आए. अलग-अलग तरह की कहानियों और किरदारों के बावजूद अमिताभ और रेखा की जोड़ी का आकर्षण लगातार बना रहा. दोनों के बीच संवादों से ज्यादा कई बार उनकी खामोशियां कहानी कहती नजर आती थीं.
‘मुकद्दर का सिकंदर’ में मोहब्बत का दर्द
1978 में आई ‘मुकद्दर का सिकंदर’ ने अमिताभ और रेखा की जोड़ी को एक अलग भावनात्मक रंग दिया. फिल्म में रेखा ने जोहरा बाई का किरदार निभाया था, जिसका प्यार सिकंदर के लिए था, लेकिन यह मोहब्बत मुकम्मल नहीं हो सकी.
फिल्म में अमिताभ का दर्द और रेखा की मोहब्बत जब आमने-सामने आती है तो कहानी सिर्फ प्रेम कहानी नहीं रह जाती. यह अधूरी चाहत और किस्मत से हार चुके दो किरदारों की कहानी बन जाती है. यही वजह है कि ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में दोनों की केमिस्ट्री आज भी याद की जाती है.
‘मिस्टर नटवरलाल’ और ‘सुहाग’ में बदला अंदाज
अमिताभ और रेखा की जोड़ी सिर्फ गंभीर और भावुक फिल्मों तक सीमित नहीं रही. ‘मिस्टर नटवरलाल’ में दोनों का अंदाज ज्यादा चुलबुला और मनोरंजक नजर आया. फिल्म का गीत ‘परदेसिया’ आज भी इस जोड़ी की लोकप्रियता की याद दिलाता है.
इसके बाद ‘सुहाग’ और ‘राम बलराम’ जैसी फिल्मों में भी दोनों कलाकार साथ नजर आए. एक्शन, कॉमेडी, ड्रामा और रोमांस. अलग-अलग जॉनर में काम करने के बावजूद दोनों की जोड़ी दर्शकों के बीच अपनी पकड़ बनाए रही.
फिर आई ‘सिलसिला’… और कहानी आगे निकल गई
अगर अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी की बात हो और ‘सिलसिला’ का नाम न आए, तो कहानी अधूरी रह जाएगी. 1981 में यश चोपड़ा की इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, रेखा और जया बच्चन मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म ने प्रेम, विवाह, रिश्तों और भावनात्मक उलझनों को बेहद संवेदनशील तरीके से पर्दे पर रखा.
‘सिलसिला’ की सबसे खास बात सिर्फ इसकी कहानी नहीं थी. दर्शकों की दिलचस्पी इस बात में भी थी कि अमिताभ और रेखा की ऑन-स्क्रीन जोड़ी को उनकी निजी जिंदगी से जोड़कर देखा जाने लगा. दोनों के रिश्ते को लेकर वर्षों से तरह-तरह की चर्चाएं और अटकलें चलती रही हैं, लेकिन उनके निजी रिश्ते को लेकर सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी सीमित रही है. इसलिए पर्दे की केमिस्ट्री और वास्तविक जिंदगी के रिश्ते के बीच फर्क करना जरूरी है.
फिल्म के गीतों ने इस एहसास को और गहरा कर दिया. ‘देखा एक ख्वाब’ में रोमांस था, ‘ये कहां आ गए हम’ में भावनाओं की गहराई और ‘नीला आसमान सो गया’ में एक अलग तरह की तन्हाई. अमिताभ और रेखा जब स्क्रीन पर एक-दूसरे के सामने होते थे तो कई बार शब्दों से ज्यादा उनकी आंखें और ठहराव कहानी कहते थे.
आखिर क्यों आज भी याद की जाती है ये जोड़ी?
अमिताभ और रेखा की जोड़ी की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी कि दोनों ने अपने किरदारों को सिर्फ निभाया नहीं, बल्कि उनमें एक ऐसा भाव पैदा किया जिसे दर्शक अपने तरीके से महसूस कर सके. अमिताभ की आवाज, उनका व्यक्तित्व और स्क्रीन पर मौजूदगी. दूसरी तरफ रेखा की आंखों में उतरती भावनाएं, संवाद अदायगी और नजाकत. दोनों का यह मेल कैमरे के सामने अलग ही असर पैदा करता था.
उनकी फिल्मों को आज भी याद करने की एक वजह यह भी है कि उस दौर में रोमांस सिर्फ नजदीकियों का नाम नहीं था. कई बार एक नजर, एक मुस्कान, एक अधूरा संवाद और दो किरदारों के बीच की खामोशी ही पूरी कहानी कह देती थी. अमिताभ और रेखा ने इसी सिनेमा को अपने अभिनय से एक अलग ऊंचाई दी.
पर्दा गिर गया, लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई
अमिताभ बच्चन और रेखा की साथ काम करने की फिल्मों का दौर भले पीछे छूट गया हो, लेकिन उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित यादों में शामिल है. ‘दो अनजाने’ से शुरू हुआ यह सफर ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के दर्द से गुजरता हुआ ‘सिलसिला’ तक पहुंचा और यहीं से दोनों की जोड़ी फिल्मों से निकलकर एक ऐसे सिनेमाई किस्से का हिस्सा बन गई, जिस पर आज भी बातें होती हैं.
शायद यही किसी फिल्मी जोड़ी की सबसे बड़ी कामयाबी होती है. फिल्म खत्म हो जाए, किरदार पर्दे से उतर जाएं, लेकिन उनकी कहानी दर्शकों के जेहन में चलती रहे. अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. **एक कहानी पर्दे पर लिखी गई थी, लेकिन उसका अफसाना आज तक खत्म नहीं हुआ.









