September 27, 2026 4:38 am

ज्ञानेश कुमार पर सवालों के बीच घिरे दोनों चुनाव आयुक्त, जानें आयोग में बवाल की अंदरूनी कहानी

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Gyanesh Kumar Controversy: चुनाव आयोग देश की चुनावी व्यवस्था की सबसे अहम संवैधानिक संस्थाओं में से एक है. ऐसे में यदि आयोग के भीतर ही किसी फैसले या प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद सामने आएं, तो सवाल सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त पर नहीं रुकते. इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट में चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आयोग के कामकाज और अलग-अलग फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं. इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, फॉर्म-6, मतदाता आंकड़ों तक पहुंच और चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था से जुड़ा था.

ये मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि ये सिर्फ सामान्य प्रशासनिक मतभेद नहीं थे. जिन मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज की गईं, उनका सीधा संबंध मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नए मतदाताओं को शामिल करने की प्रक्रिया से था. ऐसे में यदि आयोग के दो सदस्यों को किसी प्रक्रिया पर आपत्ति थी, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उनकी आपत्ति का निपटारा किस तरह किया गया.

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस दौरान कई मौकों पर अपनी असहमति दर्ज कराई. एक प्रमुख विवाद मतदाता सूची के आंकड़ों और चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था के केंद्रीकरण को लेकर था. सवाल यह था कि मतदाता सूची से जुड़े आंकड़ों पर नियंत्रण और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की भूमिका किस तरह तय की जा रही है.

यहां सबसे बड़ा सवाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से है. यदि दो चुनाव आयुक्तों ने किसी फैसले या प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी, तो उस पर अंतिम निर्णय कैसे हुआ? क्या पूरे आयोग की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई? क्या तीनों के बीच सहमति बनी? यदि सहमति नहीं बनी तो क्या बहुमत से फैसला हुआ? और यदि बहुमत की राय थी तो उसे लागू किया गया या नहीं?

रिपोर्ट में फॉर्म-6 को लेकर भी गंभीर आपत्ति का जिक्र है. फॉर्म-6 वह वैधानिक प्रपत्र है, जिसके जरिए नए मतदाता मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करते हैं. विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को प्रस्तावित बदलाव पर सवाल उठाया था. उनका कहना था कि फॉर्म-6 में इस तरह का बदलाव केवल विशेष गहन पुनरीक्षण के आदेश के जरिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह प्रपत्र मतदाता पंजीकरण से जुड़े नियमों के तहत निर्धारित है. उनके मुताबिक इसके लिए नियमों में जरूरी बदलाव की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी. सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी.

इसके बावजूद बाद में चुनाव आयोग के ऑनलाइन मंच पर ये बदलाव दिखाई दिए. इसके बाद 13 अगस्त को सुखबीर सिंह संधू ने फिर इस मुद्दे को उठाया और कथित तौर पर इन बदलावों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए उन्हें हटाने की मांग की. अब सवाल यही है कि यदि दो चुनाव आयुक्त किसी बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज कर चुके थे, तो उसके बाद क्या हुआ? क्या उनकी आपत्ति को खारिज किया गया? क्या आयोग ने इस पर औपचारिक फैसला लिया? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त की राय अलग थी? यदि अलग थी तो उसका कानूनी आधार क्या था?

इन सवालों का जवाब चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त दोनों को देना चाहिए. लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यदि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को आयोग के कामकाज को लेकर इतनी गंभीर आपत्तियां थीं और उन्हें लगातार लगता था कि उनकी बात नहीं मानी जा रही है, तो फिर उन्होंने आगे क्या कदम उठाए?

क्या उन्होंने आयोग की पूर्ण बैठक बुलाने की मांग की? क्या उन्होंने हर विवादित फैसले को औपचारिक रूप से आयोग के सामने रखने की कोशिश की? क्या उन्होंने उपलब्ध कानूनी और संवैधानिक रास्तों का इस्तेमाल किया? और यदि उन्हें लगता था कि संस्था के भीतर उनकी बात लगातार नजरअंदाज की जा रही है, तो वे पद पर बने क्यों रहे?

यहां एक बात समझना जरूरी है. मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति होना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है. किसी संवैधानिक संस्था में अलग राय दर्ज होना संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है. लेकिन यदि किसी अधिकारी को यह महसूस होने लगे कि संस्था का कामकाज कानून के मुताबिक नहीं चल रहा, तो उसके बाद उसकी अपनी भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में एक और घटनाक्रम का उल्लेख है, जो इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है. काम के बंटवारे से जुड़े 28 जुलाई के आदेश को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने मिलकर कदम उठाया. उन्होंने अलग-अलग पत्र लिखे और बाद में संयुक्त रूप से उस आदेश को पलटने की कार्रवाई की.

इससे कम से कम इतना जरूर सामने आता है कि दोनों चुनाव आयुक्त जरूरत पड़ने पर मिलकर संस्थागत स्तर पर अपनी बात रखने में सक्षम थे. ऐसे में सवाल यह है कि पहले सामने आए विवादों में उन्होंने इसी तरह की सामूहिक प्रक्रिया का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? क्या उन्होंने हर मामले में अपनी असहमति को आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया? क्या उन्होंने फैसले के खिलाफ औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई? क्या उन्होंने अपनी शक्तियों का पूरी तरह इस्तेमाल किया? इन सवालों का जवाब भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा होना चाहिए.

इसी सिलसिले में दोनों चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे का सवाल भी उठता है. सिर्फ इसलिए इस्तीफा देना जरूरी नहीं हो जाता कि किसी चुनाव आयुक्त की मुख्य चुनाव आयुक्त से राय अलग है. लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति की अपनी जगह है. लेकिन अगर किसी संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी को लगातार यह महसूस हो कि संस्था कानून के मुताबिक काम नहीं कर रही, उसकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया जा रहा है और उसके अधिकारों को सीमित किया जा रहा है, तो यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि उस अधिकारी ने अपनी आपत्ति की अंतिम सीमा कहां तय की.

यदि दोनों चुनाव आयुक्तों को लगता था कि उनकी गंभीर आपत्तियों के बावजूद व्यवस्था में बदलाव नहीं हो रहा, तो उन्होंने पद पर बने रहने का फैसला क्यों किया? क्या उन्हें लगा कि भीतर रहकर काम करना ज्यादा प्रभावी है? क्या उन्हें उम्मीद थी कि उनकी लिखित आपत्तियां भविष्य में संस्थागत जांच का आधार बनेंगी? या फिर उन्होंने माना कि मतभेदों के बावजूद आयोग के भीतर काम करना जरूरी है?

इन सवालों का जवाब उन्हीं दोनों चुनाव आयुक्तों को देना होगा.

हालांकि, इससे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर उठ रहे सवाल कम नहीं होते. यदि यह साबित होता है कि आयोग के भीतर दर्ज की गई किसी वैध आपत्ति या बहुमत की राय को नजरअंदाज किया गया, वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार किया गया या आयोग की मंजूरी के बिना कोई अहम फैसला लागू किया गया, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए. लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी सामने आना जरूरी है. यदि दो चुनाव आयुक्त लगातार आपत्तियां दर्ज कर रहे थे, तो उनकी अपनी भूमिका और उनके उठाए गए कदमों की भी जांच होनी चाहिए.

दरअसल, इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल किसी एक व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराना नहीं है. असली सवाल यह है कि चुनाव आयोग के भीतर फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए? असहमति होने पर क्या नियमों का पालन हुआ? बहुमत की व्यवस्था का इस्तेमाल हुआ या नहीं? और जो आपत्तियां दर्ज की गईं, उनका अंतिम निपटारा किस तरह किया गया?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर की इस तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सामने रखा है. अब जरूरत उन बैठकों के रिकॉर्ड, लिखित आपत्तियों और फैसलों की प्रक्रिया को सामने लाने की है, ताकि यह साफ हो सके कि किस मुद्दे पर किसकी राय थी और आखिरकार फैसला किस आधार पर लिया गया.

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने क्या किया. सवाल यह भी है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी असहमति के बाद क्या किया और क्यों किया. और जब मामला देश की मतदाता सूची और चुनावी व्यवस्था से जुड़ा हो, तो इन दोनों सवालों के जवाब जनता के सामने आना जरूरी है.

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