BRICS Summit दिल्ली का मंच सिर्फ कूटनीतिक मुलाकातों का मंच नहीं था. यहां दुनिया की बदलती आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर के संकेत भी साफ दिखाई दिए. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जिस अंदाज में G7 की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया, उसके पीछे सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी नहीं थी. यह उस वैश्विक व्यवस्था पर सीधा संदेश था, जिसमें रूस लंबे समय से पश्चिमी दबाव के बीच अपनी जगह तलाश रहा है.
पुतिन ने दावा किया कि G7 देशों की हिस्सेदारी दुनिया की अर्थव्यवस्था में करीब 18 फीसदी है, जबकि BRICS देशों की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी तक पहुंच चुकी है. इसी तुलना के बाद पुतिन का सवाल आया – आखिर G7 को अब भी उसी तरह क्यों देखा जाता है? उनका यह सवाल असल में उस बहस को हवा देता है कि क्या दुनिया की आर्थिक ताकत का केंद्र अब धीरे-धीरे पश्चिम से निकलकर नए समूहों की तरफ बढ़ रहा है.
दिल्ली के इस मंच से पुतिन ने एक और तस्वीर पेश की है. उन्होंने कहा कि दुनिया गहरे और बड़े संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही है. जिन देशों ने 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में आर्थिक विकास की अगुवाई की, उनकी जगह अब नए ग्रोथ सेंटर ले रहे हैं. इस बदलाव में भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत को उन्होंने BRICS की बढ़ती भूमिका के उदाहरण के तौर पर पेश किया.
यही वह बिंदु है जहां भारत और रूस की कहानी भी जुड़ती है. BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है और इसी दौरान पुतिन की दिल्ली यात्रा को सिर्फ एक बहुपक्षीय कार्यक्रम के तौर पर देखना अधूरा होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन के बीच करीब 45 मिनट की आमने-सामने बातचीत हुई. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह पहला मौका था जब पुतिन रूस के बाहर किसी BRICS Summit में व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए.
मोदी-पुतिन की इस मुलाकात में यूक्रेन का मुद्दा भी अहम रहा. प्रधानमंत्री मोदी ने दोहराया कि बातचीत और कूटनीति ही संघर्ष का समाधान निकालने का रास्ता है. भारत ने शांति प्रयासों में सहयोग की अपनी तत्परता भी दोहराई. यानी दिल्ली की मेज पर रूस के साथ रिश्तों की मजबूती भी थी और यूक्रेन संकट पर भारत का अपना संतुलित रुख भी.
दोनों नेताओं ने बातचीत में सिर्फ युद्ध और शांति पर चर्चा नहीं की. राजनीतिक रिश्तों से लेकर अर्थव्यवस्था, रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष तक सहयोग की समीक्षा हुई. स्किल्ड मोबिलिटी और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क को मजबूत करने पर भी बात हुई. BRICS के भीतर सहयोग और भारत की 2026 की अध्यक्षता के दौरान आगे की रणनीति पर भी चर्चा हुई.
लेकिन BRICS Business Summit में पुतिन का दूसरा संदेश और ज्यादा सीधा था. उन्होंने पश्चिमी देशों पर रूस की आर्थिक ताकत को कमजोर करने और प्रतिस्पर्धियों को रोकने की कोशिश का आरोप लगाया. पाइपलाइनों के विनाश से लेकर अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों में रुकावट, जहाजों को रोकने और प्रतिबंधों तक का जिक्र करते हुए उन्होंने पश्चिम पर आर्थिक दबदबा बनाए रखने की कोशिश का आरोप लगाया.
पुतिन ने रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का आंकड़ा भी सामने रखा. उनका दावा था कि रूस पर 30 हजार से ज्यादा प्रतिबंध लगाए गए हैं, जो दुनिया के बाकी देशों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कुल आंकड़े से भी दोगुने हैं. इसके बावजूद उन्होंने दावा किया कि रूस ने अपनी आर्थिक संप्रभुता मजबूत की है और भरोसेमंद साझेदारों के साथ अपने रिश्ते और गहरे किए हैं.
दरअसल, पुतिन का पूरा भाषण एक ही बड़ी कहानी के इर्द-गिर्द घूमता दिखा – दुनिया बदल रही है और रूस इस बदलाव में खुद को पश्चिम के विकल्प के रूप में पेश कर रहा है. BRICS को वह इसी बदलती व्यवस्था का सबसे बड़ा आर्थिक प्लेटफॉर्म बता रहे हैं. और इस तस्वीर में भारत की भूमिका लगातार बड़ी होती जा रही है.
यही वजह है कि दिल्ली में मोदी-पुतिन की मुलाकात को केवल एक और द्विपक्षीय बैठक के तौर पर देखना कहानी का आधा हिस्सा ही होगा. एक तरफ रूस पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के खिलाफ अपनी दलील दुनिया के सामने रख रहा था, दूसरी तरफ भारत रूस के साथ अपनी ‘Special and Privileged Strategic Partnership’ को आगे बढ़ाने की दिशा में बातचीत कर रहा था.
BRICS Summit की तस्वीर में इसलिए दो फ्रेम सबसे ज्यादा मायने रखते हैं. एक, मंच से पुतिन का G7 पर सवाल. दूसरा, उसी दिन मोदी के साथ उनकी लंबी आमने-सामने की बातचीत. दोनों को साथ रखकर देखें तो संदेश साफ है – वैश्विक ताकत के पुराने समीकरण बदल रहे हैं और भारत-रूस रिश्ते इस बदलती कहानी में एक अहम अध्याय बने हुए हैं.








