IRCTC: दिवाली और छठ पूजा… ये सिर्फ त्योहार नहीं, करोड़ों भारतीयों के लिए घर लौटने का सबसे बड़ा मौका है. लेकिन इस बार घर जाने की राह में सबसे बड़ी मुश्किल ट्रेन नहीं, ट्रेन की टिकट बन गई है.

यदि आप भी पिछले कुछ दिनों से सुबह-सुबह मोबाइल या लैपटॉप लेकर बैठ रहे हैं. घड़ी में 8 बजने का इंतजार कर रहे हैं. और जैसे ही टिकट बुकिंग शुरू होती है, सामने ‘Server Busy’, ‘Error’ या कुछ ही मिनटों में ‘REGRET’ लिखा दिखाई देता है, तो यकीन मानिए, ये परेशानी सिर्फ आपकी नहीं है.

सवाल ये है कि आखिर टिकट जाती कहां है? क्या हजारों सीटें वाकई कुछ सेकंड में बुक हो जाती हैं? या फिर टिकट की इस पूरी जंग में आम यात्री से आगे कोई और निकल चुका है? यही वो सवाल है, जिसका जवाब तलाशना जरूरी है.

सुबह 8 बजते ही टिकट की रेस

त्योहारों के मौसम में जैसे ही आरक्षण की खिड़की खुलती है, लाखों लोग एक साथ IRCTC की वेबसाइट और ऐप पर पहुंच जाते हैं. कोई नाम और उम्र भर रहा है… कोई CAPTCHA सुलझा रहा है… कोई भुगतान की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहा है… और इसी बीच कुछ यात्रियों के सामने अचानक लिखा आता है- REGRET. मतलब सीट खत्म.

लेकिन आम यात्री के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी जल्दी सीटें खत्म कैसे हो गईं? क्या आम आदमी की उंगलियां इतनी धीमी हैं या फिर व्यवस्था की रफ्तार किसी और के लिए अलग है?

रेलवे पर उठते रहे हैं सवाल

रेलवे टिकट बुकिंग में कथित तौर पर इस्तेमाल होने वाले स्वचालित सॉफ्टवेयर और बॉट्स लंबे समय से सवालों के घेरे में रहे हैं.

आरोप है कि ऐसे सॉफ्टवेयर बेहद तेजी से यात्री की जानकारी भरने, टिकट बुकिंग की प्रक्रिया को स्वचालित करने और भुगतान तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. यानी एक तरफ आम यात्री स्क्रीन पर नाम, उम्र और CAPTCHA भरने में लगा है.

तो दूसरी तरफ स्वचालित सॉफ्टवेयर की मदद से टिकट बुकिंग को बेहद तेजी से पूरा करने की कोशिश हो सकती है. यही वजह है कि टिकट बुकिंग की पूरी प्रक्रिया आम आदमी के लिए कई बार ऐसी दौड़ बन जाती है, जिसमें वह शुरुआत से ही पीछे दिखाई देता है.

IRCTC पर रोज लाखों टिकट

IRCTC पर रोजाना लाखों आरक्षित टिकटों की बुकिंग होती है और इसका बड़ा हिस्सा ऑनलाइन होता है. यानी करोड़ों यात्रियों की उम्मीद अब एक वेबसाइट और ऐप की स्क्रीन से जुड़ी है.

लेकिन त्योहारों के समय टिकट की मांग अचानक इतनी बढ़ जाती है कि बुकिंग शुरू होने के शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम हो जाते हैं.

यहीं से शुरू होता है असली सवाल- क्या तकनीक ने आम यात्री की जिंदगी आसान की है या टिकट की जंग को और मुश्किल बना दिया है?

व्यवस्था के बावजूद सवाल कायम

रेलवे की तरफ से टिकट बुकिंग में धोखाधड़ी और स्वचालित बुकिंग रोकने के लिए एंटी-बॉट तकनीक, आधार सत्यापन और दूसरे सुरक्षा उपायों की बात कही जाती रही है.

लेकिन आम यात्री के सामने सवाल तकनीक के दावों का नहीं, नतीजे का है. उसके सामने जब सुबह 8 बजे के कुछ ही मिनट बाद REGRET आ जाता है, तो उसके लिए यही सबसे बड़ी सच्चाई है.

वह पूछता है- अगर व्यवस्था इतनी सुरक्षित है, तो टिकट इतनी तेजी से गायब क्यों हो रही हैं?

…और फिर रेलवे का वो जवाब

जब परेशान यात्री टिकट दलालों और कालाबाजारी की शिकायत करता है, तो रेलवे की तरफ से यात्रियों को यह समझाने की कोशिश भी की गई है कि दलालों को बढ़ावा आखिर कौन देता है.

तर्क दिया जाता है कि जब लोग मजबूरी में ज्यादा पैसे देकर दलालों से टिकट खरीदते हैं, तो इससे कालाबाजारी करने वालों का हौसला बढ़ता है.

बात अपनी जगह सही हो सकती है. लेकिन आम यात्री का सवाल भी उतना ही सीधा है. यदि टिकट आसानी से और निष्पक्ष तरीके से मिल जाए, तो कोई दलाल के पास जाएगा ही क्यों?

आम आदमी को उपदेश नहीं चाहिए. उसे कन्फर्म टिकट चाहिए.

आम आदमी करे तो क्या करे?

सोचिए… दिवाली है. छठ है. सालभर दूसरे शहर में नौकरी करने वाला बेटा घर लौटना चाहता है.

मां-बाप इंतजार कर रहे हैं. बच्चे नाना-नानी या दादा-दादी के घर जाने का सपना देख रहे हैं. लेकिन टिकट की स्क्रीन पर लिखा है- REGRET.

वो कोई VVIP नहीं है कि एक फोन करेगा और अगले ही पल कोई रास्ता निकल आएगा. उसके लिए ट्रेन की टिकट सिर्फ एक आरक्षण नहीं है. वो अपने घर लौटने का रास्ता है. और जब वही रास्ता बंद दिखाई देता है, तो मजबूरी में वह हर विकल्प तलाशने लगता है. यहीं से दलालों का बाजार मजबूत होता है.

सवाल रेलवे से है…

रेलवे देश की लाइफलाइन है. त्योहारों के समय उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. इसलिए सवाल सिर्फ ये नहीं है कि कितनी ट्रेनें चलाई गईं. सवाल ये भी है कि उन ट्रेनों की टिकट आम आदमी को कितनी आसानी से मिली?

यदि टिकट बुकिंग की व्यवस्था में कोई खामी है, तो उसे दूर कौन करेगा? यदि बॉट्स और स्वचालित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हो रहा है, तो उन्हें रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि कालाबाजारी हो रही है, तो टिकट आम आदमी की पहुंच से बाहर क्यों जा रही है?

और सबसे बड़ा सवाल- त्योहार पर घर जाने का हक क्या सिर्फ उसी का है, जो ज्यादा पैसे देकर टिकट खरीद सकता है?

रेल मंत्री से सीधा सवाल

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से आम यात्री की उम्मीद बहुत सीधी है. उसे आंकड़े नहीं चाहिए. उसे सफाई नहीं चाहिए. उसे बस ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां टिकट बुक करने के लिए उसे किसी दलाल, बॉट या जुगाड़ का सहारा न लेना पड़े.

आम आदमी को ज्ञान नहीं, व्यवस्था चाहिए.

ऐसी व्यवस्था जिसमें सुबह 8 बजे बुकिंग की खिड़की खुले तो आम यात्री को कम से कम ये भरोसा तो हो कि मुकाबला इंसानों के बीच है, मशीनों के बीच नहीं.

दिवाली और छठ पर लोग अपने घर जाना चाहते हैं. उन्हें सिर्फ एक कन्फर्म टिकट चाहिए.

अब देखना ये है कि रेलवे उनकी इस छोटी सी उम्मीद को पूरा कर पाता है या फिर इस बार भी लाखों यात्रियों की स्क्रीन पर सिर्फ एक ही शब्द चमकेगा- REGRET.