उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच Yogi Adityanath सरकार के एजेंडे में गो संरक्षण एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. बुलंदशहर में गोमूत्र की खरीद से शुरू हुआ नया प्रयोग गाय, किसान, महिला और जैविक खेती को एक ही आर्थिक मॉडल में जोड़ने का दावा कर रहा है. सवाल यह है कि यह पहल जमीन पर कितना असर पैदा करती है और क्या इसे चुनावी नैरेटिव से अलग देखा जा सकता है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाय सिर्फ एक पशु नहीं रही है. यह आस्था का मुद्दा है, राजनीति का मुद्दा है और पिछले कुछ वर्षों में सरकार की नीतियों का भी अहम हिस्सा बनी है. अब इसी गो संरक्षण की कहानी को एक नए आर्थिक मॉडल के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है.
गोमूत्र 10 रुपये लीटर
सुनने में यह प्रयोग भले ही अलग लगे, लेकिन इसके पीछे सरकार की सोच साफ दिखाई देती है – गोवंश का संरक्षण सिर्फ भावनात्मक मुद्दा न रहे, बल्कि उसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए. किसान और पशुपालक दूध के साथ गोमूत्र से भी कमाई करें, महिलाएं संग्रहण व्यवस्था से जुड़ें और इसी गोमूत्र से खेती के लिए उत्पाद तैयार किए जाएं.
यानी गाय को लेकर राजनीति से आगे बढ़कर ‘गाय से गांव की अर्थव्यवस्था’ का मॉडल खड़ा करने की कोशिश. लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी शुरू होता है कि क्या यह वास्तव में जमीन पर टिकने वाला आर्थिक मॉडल है या चुनाव से पहले तैयार किया जा रहा एक नया नैरेटिव?
बुलंदशहर से प्रयोग शुरू
बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव में एफपीओ के जरिए इस मॉडल को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है. इसके दायरे में आसपास के करीब 15 गांवों को जोड़ा गया है. स्थानीय स्तर पर गोमूत्र संग्रह के लिए केंद्र बनाए गए हैं. दावा है कि इन केंद्रों पर रोज करीब 500 लीटर गोमूत्र इकट्ठा हो रहा है. फिलहाल खरीद की दर 10 रुपये प्रति लीटर है और आगे इसे 20 रुपये तक ले जाने की योजना बताई जा रही है.
गांवों में 200 लीटर क्षमता के टैंक लगाए गए हैं, ताकि पशुपालकों को गोमूत्र बेचने के लिए दूर न जाना पड़े. कागज पर मॉडल सीधा है – गोमूत्र घर से निकला, गांव में बिका और पशुपालक को दूध के अलावा एक और आमदनी मिल गई. लेकिन किसी भी पायलट प्रोजेक्ट की असली परीक्षा आंकड़ों से नहीं, उसकी निरंतरता से होती है.
क्या रोज 500 लीटर का संग्रह लंबे समय तक कायम रह पाएगा? क्या खरीद की यही दर बनी रहेगी? क्या तैयार उत्पादों के लिए पर्याप्त बाजार मिलेगा? और सबसे अहम – क्या इससे वास्तव में पशुपालकों की आय में ऐसा बदलाव आएगा जिसे बड़े पैमाने पर दोहराया जा सके? इन सवालों के जवाब इस प्रयोग की सफलता तय करेंगे.
गाय के साथ महिला को जोड़ने की कोशिश
इस मॉडल का एक दिलचस्प हिस्सा महिलाओं की भागीदारी है. गोमूत्र संग्रह में सहयोग करने वाली महिलाओं को दो रुपये प्रति लीटर कमीशन दिया जा रहा है. करीब 300 महिलाओं को इस पहल से जोड़कर शेयरहोल्डर बनाए जाने की बात कही गई है.
यानी सरकार और इससे जुड़े लोग इस प्रयोग को सिर्फ गो संरक्षण के तौर पर पेश नहीं कर रहे, बल्कि इसे महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण रोजगार से जोड़ रहे हैं. इसका फायदा अगर लगातार मिलता है तो निश्चित तौर पर ग्रामीण महिलाओं के लिए घर और गांव के आसपास अतिरिक्त आमदनी का एक रास्ता खुल सकता है. लेकिन यहां भी सवाल वही है कि कितनी आय? कितने समय तक? और कितनी महिलाओं के लिए?
दो रुपये प्रति लीटर का कमीशन सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन किसी बड़े आर्थिक मॉडल की सफलता इस बात से तय होगी कि एक महिला महीने में इससे वास्तविक रूप से कितनी कमाई कर पाती है.
गोमूत्र से खेती तक पहुंचाने की कोशिश
इस मॉडल की अगली कड़ी गोमूत्र से खेती के लिए उत्पाद तैयार करने की है. बताया गया है कि एकत्र किए गए गोमूत्र में जड़ी-बूटियां मिलाकर खेती में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. इन्हें समितियों के जरिए किसानों तक पहुंचाने की योजना है.
यहीं यह पहल गो संरक्षण से निकलकर प्राकृतिक और जैविक खेती के नैरेटिव में प्रवेश करती है. सरकार से जुड़े लोगों का दावा है कि ये उत्पाद रासायनिक विकल्पों की जगह इस्तेमाल किए जा सकते हैं और फसलों के लिए उपयोगी हैं.
हालांकि, इस दावे को बड़े स्तर पर स्वीकार करने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण, प्रभाव के आंकड़े और किसानों के अनुभवों को देखना जरूरी होगा. किसी भी कृषि उत्पाद की सफलता सिर्फ उसके प्राकृतिक होने से तय नहीं होती, बल्कि यह भी देखना होता है कि वह फसल पर कितना असर डालता है, किसान की लागत कितनी घटाता है और उत्पादन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है. यही वह जगह है जहां दावा और जमीन की हकीकत अलग-अलग हो सकती है.
असली सवाल: गाय पालना फायदे का सौदा बनेगा?
उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आवारा गोवंश नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक उपयोगिता भी है. किसान के लिए सवाल भावनाओं से ज्यादा रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का है. पशु को खिलाने-पिलाने और उसकी देखभाल पर खर्च होता है. ऐसे में अगर दूध के अलावा गोमूत्र की भी नियमित खरीद होने लगे तो निश्चित रूप से पशुपालक को अतिरिक्त आय मिल सकती है.
10 रुपये प्रति लीटर की खरीद और भविष्य में 20 रुपये तक की संभावित दर इस मॉडल को आकर्षक बनाने की कोशिश है.
लेकिन यह तभी बड़ा बदलाव बन सकता है जब खरीद नियमित हो, भुगतान समय पर हो और बाजार लगातार बना रहे. अगर इन तीनों में से कोई एक कड़ी कमजोर हुई तो पूरा मॉडल भी कमजोर पड़ सकता है.
चुनावी कनेक्शन को नजरअंदाज करना आसान नहीं
अब आते हैं सबसे संवेदनशील सवाल पर कि क्या यह चुनावी तैयारी है? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच सरकार की योजनाओं का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है. गो संरक्षण पहले से ही योगी सरकार की पहचान से जुड़ा मुद्दा रहा है. ऐसे में गोमूत्र की खरीद को ग्रामीण आय, महिला सशक्तीकरण और प्राकृतिक खेती से जोड़ना राजनीतिक रूप से भी एक बड़ा नैरेटिव तैयार करता है.
लेकिन सिर्फ चुनाव करीब होने से किसी योजना को चुनावी कहना भी उतना ही आसान निष्कर्ष होगा. बुलंदशहर का प्रयोग अगर वास्तव में पशुपालकों की आमदनी बढ़ाता है, महिलाओं को नियमित रोजगार देता है और किसानों के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार करता है, तो इसे सिर्फ चुनावी कवायद कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.
दूसरी तरफ अगर यह मॉडल कुछ गांवों के पायलट से आगे नहीं बढ़ पाता, खरीद अनियमित हो जाती है या उत्पादों का बाजार तैयार नहीं होता, तो सवाल उठना भी तय है कि आखिर इसका वास्तविक लाभ किसे मिला.
असली परीक्षा विस्तार के वक्त होगी
बुलंदशहर का प्रयोग फिलहाल एक पायलट है. इसकी सबसे बड़ी परीक्षा तब होगी जब इसे उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों में ले जाने की कोशिश होगी. एक जिले और कुछ गांवों में मॉडल चलाना और करोड़ों की आबादी वाले राज्य में इसे लागू करना दो अलग बातें हैं.
अगर सरकार गो संरक्षण को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना चाहती है तो सिर्फ गोमूत्र खरीदना काफी नहीं होगा. उसके लिए संग्रह से लेकर प्रोसेसिंग, गुणवत्ता, उत्पाद की बिक्री, किसानों की स्वीकार्यता और पशुपालकों को नियमित भुगतान तक पूरी सप्लाई चेन बनानी होगी.
यानी गाय के संरक्षण की कहानी अब सिर्फ ‘गौशाला बनाम आवारा पशु’ तक सीमित नहीं रह सकती. इसे अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश हो रही है.
तो फिर कितना चुनावी, कितनी हकीकत?
फिलहाल इसका जवाब पूरी तरह किसी एक खाने में रखना जल्दबाजी होगी. चुनावी एंगल इसलिए है क्योंकि समय चुनाव से पहले का है और गो संरक्षण योगी सरकार के पुराने एजेंडे का हिस्सा रहा है. हकीकत इसलिए है क्योंकि बुलंदशहर में खरीद, संग्रह और महिलाओं की भागीदारी का एक वास्तविक पायलट मॉडल शुरू किया गया है.
और फसाने का खतरा तब पैदा होगा जब दावों को आंकड़ों और नतीजों से ज्यादा बड़ा बना दिया जाए. आखिर किसी भी योजना की असली कहानी सरकारी प्रेस नोट में नहीं, गांव के उस किसान और महिला की जेब में लिखी जाती है, जिसकी जिंदगी उससे बदलने का दावा किया जा रहा है.








